प्रासंगिक - डॉ. नारळीकर - खगोल विज्ञान विज्ञान साहित्यिक
डॉ.जयंत नारळीकर: खगोलशास्त्री और विज्ञान साहित्यकार
संभवतः यह साल 1980 के मार्च-अप्रैल का महीना रहा होगा। हमारी नौवीं कक्षा की स्कूली परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थीं और हम नतीजों का इंतज़ार कर रहे थे। स्कूल की छुट्टियाँ थीं, लेकिन दूसरी गतिविधियों के लिए हम कभी-कभार साइकिल से स्कूल का चक्कर लगा आते थे। एक दिन पता चला कि नागपुर के रवि नगर में हमारे सी.पी. एंड बेरार स्कूल के पास स्थित 'राज्य विज्ञान संस्थान' में डॉ.जयंत नारळीकर का व्याख्यान होने वाला है।
उन दिनों आज की तरह मीडिया की भरमार नहीं थी। नागपुर में तो उस समय दूरदर्शन के कार्यक्रम भी नहीं दिखते थे, इसलिए उस माध्यम को लेकर भी बड़ा कौतुक था। किताबों, अखबारों और पत्रिकाओं में छपने वाली तस्वीरें ही हमारी दृश्य-दुनिया थीं। अगर कोई महत्वपूर्ण कार्यक्रम, क्रिकेट मैच या किसी अति-महत्वपूर्ण व्यक्ति को देखना होता, तो कार्यक्रम में खुद उपस्थित होना पड़ता था; या फिर कभी सिनेमा देखने जाने पर मुख्य फिल्म से पहले दिखाए जाने वाले 'फिल्म्स डिवीजन' के समाचार चित्र (न्यूज़ रील) देखना, यही कुछ सीमित विकल्प उपलब्ध थे। इसलिए नारळीकर जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक और प्रतिष्ठित साहित्यकार को आमने-सामने देखने का मौका गंवाना नामुमकिन था।
व्याख्यान के दिन मैं और मेरे एक-दो दोस्त समय से पहले ही कार्यक्रम स्थल पर पहुँच गए। राज्य विज्ञान संस्थान के वरिष्ठ अधिकारी, विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर और अधिकांश श्रोता भी टाई, सूट और बूट जैसे औपचारिक पहनावे में उपस्थित थे। हम थोड़े झिझक गए थे, लेकिन नारळीकर जी को साक्षात् देखने की जिद में वहीं डटे रहे। आखिरकार वह घड़ी आ ही गई। नारळीकर जी की गाड़ी संस्थान के मुख्य द्वार के सामने आकर रुकी। गाड़ी के चारों तरफ एक ही भीड मच गयी। हमें लगा कि इस कोलाहल में हम उन्हें ठीक से देख नहीं पाएंगे और हम थोड़े मायूस हो गए।
लेकिन हमारे हाथ निराशा नहीं लगी। क्योंकि 'मुख्य अतिथि' का मतलब सूट-टाई जैसी औपचारिक पोशाक होगी, इस रूढ़ धारणा को पूरी तरह तोड़ते हुए डॉ. नारळीकर पाजामा जैसी पतलून, सूती कपड़े की पतली शर्ट और चप्पल जैसे बेहद साधारण पहनावे में थे। इस सादगी के कारण वे उस भीड़ में भी तुरंत अलग और विशिष्ट दिखाई दिए। औपचारिकताएं पूरी होने के बाद जब वे बोलने के लिए खड़े हुए, तो उन्होंने अपने स्वभाव के अनुरूप पहली ही पंक्ति में शिक्षा, विज्ञान और व्यावहारिक जीवन के अंतर्विरोधों पर अत्यंत विनम्र लेकिन मर्मस्पर्शी टिप्पणी की। उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा, "नागपुर की इस भीषण गर्मी में आप सभी भौतिक विज्ञान के छात्र और प्रोफेसर इस वातावरण के बिल्कुल भी अनुकूल न होने वाले पहनावे में कैसे रह लेते हैं?" मुझे याद है, मंच पर बैठे और सभागार में उपस्थित सभी गणमान्य लोगों के चेहरों पर थोड़ी शर्मिंदगी के भाव फैल गए थे। लेकिन मेरे मन में प्रथम प्रत्यक्ष दर्शन मे ही डॉ. नारळीकर के प्रति सम्मान और भी ज्यादा बढ़ गया।
आगे चलकर नौकरी के सिलसिले में आकाशवाणी भोपाल और मुंबई का सफर करते हुए, साल 1992 में मैं पुणे आकाशवाणी में शामिल हुआ। आकाशवाणी में 'ड्यूटी रूम' विभाग मानो गाँव में 'चौपाल' जैसा होता है। हालाँकी मैंने अपना अधिकांश समय इसी विभाग में काम करते हुए बिताया, लेकिन इसी बीच कुछ दिनों के लिए मेरा तबादला मराठी भाषण विभाग में हो गया और मेरे सामने कई नए अवसर आए।
नागपुर में जिस डॉ. नारळीकर को सिर्फ एक झलक देखने के लिए मैंने इतनी मशक्कत की थी, उनसे करीब से मिलने और बातचीत करने का यह सुनहरा मौका पंद्रह-सोलह साल बाद मेरे पास बिना किसी विशेष प्रयास या योग्यता के खुद-ब-खुद आ गया। मेरी याददाश्त के अनुसार, उस समय आकाशवाणी पुणे केंद्र से 'थोरांशी गप्पा' (महानुभावों से बातचीत) जैसा कोई कार्यक्रम प्रसारित होता था। इस कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के दिग्गजों को अलग-अलग विषयों पर बोलने का अवसर देकर उनके जीवन के सफर को उजागर किया जाता था। इसका एक भाग डॉ. नारळीकर पर तय किया गया था। मेरे वरिष्ठ अरविंद गोविलकर ने सारी योजना बनाई थी।नारळीकर जी रिकॉर्डिंग के लिए आकाशवाणी केंद्र आने वाले थे। मुझे उनके साथ चाय पीने और अनौपचारिक बातचीत में शामिल होने का अवसर मिला।
प्रोडक्शन का हिस्सा होने की नाते रिकॉर्डिंग की ज़िम्मेदारी मेरी थी। रिकॉर्डिंग करीब एक घंटे तक चली। हिंदी माध्यम से नगर निगम स्कूल में हुई शिक्षा, सब्जी बाज़ार का हिसाब-किताब, और 'आयुका' (Inter-University Centre for Astronomy and Astrophysics - IUCAA) के निर्माण में उनका योगदान जैसी कितनी ही बातें मैं सीधे उन्हीं के मुंह से सुन रहा था। इस पूरे समय के दौरान जो बात मेरे मन पर फिर से अंकित हुई, वह थी उनकी बेदाग सादगी। एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक के साथ उठते-बैठते, बात करते और कभी-कभार कुछ सुझाव देते समय मन पर कोई दबाव नहीं था; काम में जो सहजता आई और वह बेहतरीन तरीके से पूरा हुआ, उसका सारा श्रेय डॉ. नारळीकर को ही जाता है। एक और बात जो मेरे मन में घर कर गई, वह थी उनकी सहज, सुंदर और धाराप्रवाह मराठी भाषा। इस पूरी रिकॉर्डिंग के दौरान उन्होंने बिना किसी हठधर्म के, भूलकर भी एक भी अंग्रेजी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया—यहाँ तक कि विज्ञान के तकनीकी शब्दों को भी उन्होंने अपवाद नहीं बनने दिया।
डॉ. नारळीकर को विज्ञान का गौरवशाली उत्तराधिकार अपने गणितज्ञ पिता विष्णु वासुदेव से मिला, जबकि कला और साहित्य का उत्तराधिकार संस्कृत की विदुषी माँ सुमती विष्णु से प्राप्त हुआ। आकाशमंडल के साथ-साथ साहित्य के प्रांगण में भी उनकी सहज आवाजाही का यही मुख्य रहस्य रहा होगा।
डॉ. नारळीकर को दुनिया भर में उनकी 'कन्फॉर्मल ग्रॅव्हिटी थिअरी' (Conformal Gravity Theory) के लिए जाना जाता है। खगोल विज्ञान को आम लोगों तक पहुँचाने में उनकी भूमिका बेहद अमूल्य है। उनकी पहली ही किताब 'यक्षांची देणगी' को महाराष्ट्र राज्य सरकार का पुरस्कार मिला। वे महज 26 वर्ष की आयु में पद्मभूषण (PADMA BHUSHAN) पुरस्कार के हकदार बने। साल 2004 में उन्हें पद्मविभूषण (PADMA VIBHUSHAN) से सम्मानित किया गया। 2010 में उन्हें महाराष्ट्र भूषण (MAHARASHTRA BHUSHAN) पुरस्कार से नवाजा गया। 1996 में उन्हें यूनेस्को (UNESCO) का प्रतिष्ठित कलिंग पुरस्कार (KALINGA AWARD) प्राप्त हुआ। 2014 में जयंत नार्लीकर की आत्मकथा 'चार महानगरातले माझे विश्व' को साहित्य अकादमी (SAHITYA ACADEMY) पुरस्कार मिला। नासिक में प्रस्तावित, लेकिन कोरोना महामारी के कारण स्थगित हुए 94वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद के लिए भी उन्हें चुना गया था।
जयंत नारळीकर स्वभाव से बेहद मृदुभाषी और सौम्य थे। लेकिन जब किसी गलत चीज़ को गलत कहने और उसे सही जगह पर पूरी स्पष्टता के साथ रखने की बात आती है, तो वे बिल्कुल भी ढुलमुल रवैया नहीं अपनाते। एक इंटरव्यू के दौरान नारळीकर जी ने बताया था कि उनके गुरु फ्रेड हॉयल (Fred Hoyle) और स्टीफन हॉकिंग (Stephen Hawking) के बीच कुछ विवाद हो गया था। बीबीसी (BBC) द्वारा बनाई गई एक फिल्म में इसका ज़िक्र है। लेकिन उस फिल्म में नारळीकर के अनुसार कुछ गलत और पूरी तरह से एकतरफा प्रस्तुति की गई थी। उस फिल्म के निर्माण के दौरान जब बीबीसी ने उनसे संपर्क किया, तो उन्होंने बताया था कि वह संदर्भ कैसा होना चाहिए; फिर भी, शायद हॉकिंग के लोकप्रियता के प्रभाव या किसी अन्य कारण से, वह फिल्म हॉकिंग के दृष्टिकोण का समर्थन करने वाली और एकतरफा ही बनाई गई। नारळीकर जी कहते हैं कि यदि वे अभी भी इससे सीख लेकर इसमें कुछ सुधार करना चाहें, तो वे और अधिक जानकारी देने के लिए तैयार हैं। विशेष बात यह है कि वे यह सारी बात बीबीसी को दिए गए इंटरव्यू में ही कहने का साहस दिखाते हैं, और बीबीसी भी इस बयान को हटाए बिना इंटरव्यू का प्रसारण करता है।
एक अन्य स्थान पर वे यह भी कहते हैं कि शनि और मंगल जैसे ग्रहों के बारे में हमारे यहाँ जो धारणाएं बनी हुई हैं, वे दरअसल ग्रीक संस्कृति से हमारे पास आई हैं। वेदों में फलित ज्योतिष का कोई उल्लेख तक नहीं है। ये चीज़ें बहुत बाद के काल में आईं। उन्होंने पूरी दृढ़ता के साथ प्रतिपादित किया है कि यह एक 'आयातित अंधविश्वास' (Imported Superstition) है।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इतनी ख्याति अर्जित करने के बाद, खगोल विज्ञान के अनुसंधान (रिसर्च) और उसे जन-उन्मुख बनाने के लिए वे 1972 में भारत लौट आए। शुरुआत में उन्होंने मुंबई में 'टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च' (TIFR) के खगोल विज्ञान विभाग के प्रमुख की जिम्मेदारी संभाली। आगे चलकर, 1988 में वे पुणे की 'आयुका' (IUCAA) संस्था के निदेशक बने।
भारत भूमि यानी अपनी मातृभूमि को कर्मभूमि बनाने के संदर्भ में उनकी भावना वीर सावरकर की इन पंक्तियों के जैसी ही है: "जगदनुभव-योगे बनुनी । मी तव अधिक शक्त उद्धरणी ।
गुण-सुमनें मी वेचियली या भावें । की तिने सुगंधा घ्यावें जरी उद्धरणी व्यय न तिच्या हो साचा । हा व्यर्थ भार विद्येचा" (वैश्विक अनुभवों से समृद्ध होकर मैं अपनी मातृभूमि के उत्थान के लिए और अधिक सक्षम बनूँ... मैंने ज्ञान रूपी फूलों को इसी भावना से चुना है कि मेरी मातृभूमि इसकी सुगंध ले सके; यदि यह ज्ञान उसके उत्थान में काम न आए, तो इस विद्या का बोझ उठाना पूरी तरह व्यर्थ है।) जब उनके कार्यों और वचनों से यह महसूस होता है, तब इस अगाध विद्वत्ता से परिपूर्ण वैज्ञानिक की ऊंचाई धवल हिमालय की उत्तुंग चोटियों जैसी प्रतीत होती है, और हमारे मन में स्वतः ही यह भाव जाग उठता है—'पाहिन पूजिन ठेविन माथा' (उन्हें देखूँ, पूजूं और श्रद्धा से अपना सिर झुकाऊँ)।
- नितिन सप्रे nitinnsapre@gmail.com

नितिन हमें तुम्हारे ऊपर गर्व है कि आपने जो भी आकाशवाणी की सेवा की है उसके पहले से ही आपने सभी बड़ी-बड़ी हस्तियों से उनके प्रसिद्ध या अप्रसिद्ध होने से पहले मुलाकात करने की दृढ़ता दिखाई थी। इसलिए आपको भगवान ने अच्छी जगह पर पोस्टिंग देकर आपकी जिज्ञासा को और परिपक्व बनाया। मैं यह चाहता हूं कि आप 100 साल तक के कम से कम जिए और यही आपकी खासियत दिन दुगनी और रात चौगुनी बढ़ती रहे। हरि ओम
उत्तर द्याहटवा