प्रासंगिक - याद आ गया कोई
जागता हुआ स्वप्न
मुकेश चंद माथुर हिंदी सिनेमा के लिए बीसवीं सदी के चालीस के दशक में देखा गया एक सुरीला सपना थे। 'सपना' कहते ही उसका संबंध निद्रावस्था से जुड़ जाता है—बंद आँखों से देखा गया एक अहसास... लेकिन मुकेश नाम का यह सपना पारखी संगीत प्रेमियों ने खुली आँखों और तृप्त कानों से अक्षरशः जिया है, जी रहे हैं और हमेशा जीते रहेंगे।
रुपहले पर्दे पर कदम रखते समय मुकेश की पहचान एक गायक-अभिनेता के रूप में स्थापित होने की महत्वाकांक्षा थी, लेकिन उनकी पहली फिल्म 'निर्दोष' दर्शकों का दिल जीतने में असफल रही। कुछ और प्रयासों के बाद मुकेश ने अभिनय को अलविदा कहकर पूरा ध्यान पार्श्वगायन (प्लेबैक सिंगिंग) पर केंद्रित कर दिया। मुकेश पर उस दौर के सुप्रसिद्ध गायक कुंदनलाल सहगल का गहरा प्रभाव था। वे सहगल साहब को अपना आदर्श मानते थे। पार्श्वगायक के रूप में मुकेश ने फिल्म पहली नज़र (1945) के लिए जो पहला गीत गाया था—'दिल जलता है तो जलने दे'—उसे सुनकर लोगों को यही भ्रम हुआ कि इसे खुद सहगल साहब ने ही गाया है। इस गीत के ज़रिए मुकेश ने पहली नज़र में ही श्रोताओं के दिलों में जो जगह बनाई, वह हमेशा कायम रही; उनके अंतिम गीत 'चंचल शीतल निर्मल कोमल संगीत की देवी सुर सजनी' तक। फिल्म संगीत के प्रेमियों ने तो उन्हें 'सत्यम शिवम सुंदरम' ही माना। हालांकि एक संयोग यह भी रहा कि जनश्रुति के अनुसार उनके पहले और आखिरी—दोनों ही गीतों को विशेष प्रयासों के बाद फिल्म में जगह मिल सकी थी।
जादुई आकर्षण
मुकेश की आवाज़ में एक ऐसा अद्भुत रसायन था जो सीधा दिल को छू लेता था। पहले ज़माने में भाप के इंजन वाली रेलगाड़ी की सीटी से ठंड के दिनों में जो 'सिसकी' महसूस होती थी, वही अहसास उनकी आवाज़ और सुरों से होता है। गीली मिट्टी (मृदगंध) की महक वाला थोड़ा सा आर्द्र (नम) सुर शायद ईश्वर ने खुद मुकेश के गले में बोया, पिरोया था। उस सुर में सच्चापन और निश्छलता महसूस होती थी, इसीलिए प्रशंसकों ने उसे 'दिव्य' या 'स्वर्गीय' की उपमा दी। संगीतकार अनिल बिस्वास ने मुकेश की आवाज़ को 'गोल्डन वॉइस' का नाम दिया था, वहीं खय्याम साहब को उनकी आवाज़ में एक जादुई आकर्षण महसूस होता था। हालांकि कुछ लोगों की नज़र में यह आवाज़ रोनी या सर्दी से भरी हुई लगती थी—खैर, अपनी-अपनी आकलन क्षमता की बात है! गायक के तौर पर उनके गले की कुछ सीमाएँ ज़रूर थीं, इस बात को मानना पड़ेगा; लेकिन लयकारी और भावुक प्रस्तुति के अनोखे मिश्रण से मुकेश जी ने उन कमियों को पूरी तरह मिटा दिया।
वेदना का आविष्कार
यद्यपि मुकेश ने कई प्रकार के गीत गाये, लेकिन दिल की गहराइयों में छिपी वेदना को अभिव्यक्त करने वाले गीत उन्हें अधिक प्रिय थे। दिल को झकझोर देने वाली एक विरहाग्नि से भरी पंक्तियाँ गाने के लिए यदि उन्हें अन्य दस गानों का त्याग भी करना पड़ता, तो भी वे उसके लिए सहर्ष तैयार रहते थे।
अभिनय का अनुभव बहुत उत्साहजनक न रहने के कारण मुकेश ने तय किया कि एक घटिया अभिनेता बनने से बेहतर है कि एक अव्वल दर्जे का गायक बना जाए और उन्होंने अपना सारा ध्यान पार्श्वगायन पर केंद्रित कर दिया। शुरुआत में सहगल साहब की छाया में रहने के बाद धीरे-धीरे उन्होंने अपनी खुद की शैली विकसित की और अपार लोकप्रियता हासिल की। इस यात्रा में दिलीप कुमार का चेहरा, मजरूह सुल्तानपुरी के शब्द और नौशाद का संगीत—इस त्रिवेणी संगम वाली फिल्म अंदाज़ (1949) ने अहम भूमिका निभाई। इसमें गाए 'तू कहे अगर जीवन भर' और 'झूम झूम के नाचो आज' जैसे गीत बेहद मशहूर हुए। इसके बाद मेरी जानकारी के मुताबिक मजरूह, मुकेश और नौशाद की यह तिकड़ी दोबारा साथी (1968) में एक साथ आई और श्रोताओं को 'मेरा प्यार भी तू है' जैसा कालजयी गीत दिया।
मुकेश ने मोतीलाल, दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार, भारत भूषण, मनोज कुमार, फिरोज़ खान, धर्मेंद्र, शशि कपूर, जितेंद्र, राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन जैसे लगभग सभी शीर्ष अभिनेताओं को अपनी आवाज़ दी। लेकिन जब उन्होंने शंकर-जयकिशन के निर्देशन में शैलेंद्र और हसरत जयपुरी के लिखे गीतों को राज कपूर के लिए अपने सुरों में पिरोया, तो सही मायनों में 'मुकेश युग' का आगाज़ हुआ।
1949 में आई फिल्म बरसात से मुकेश के विरह-व्याकुल और मधुर सुरों की जो बरसात शुरू हुई, उसने संगीत प्रेमियों को सराबोर कर दिया।
'मेरे टूटे हुए दिल से' (छलिया, 1960), 'दोस्त दोस्त ना रहा प्यार प्यार ना रहा' (संगम, 1964), 'दुनिया बनाने वाले' (तीसरी कसम, 1966), 'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार' (अनाड़ी, 1959), 'आवारा हूँ' (आवारा, 1951), 'जाने कहाँ गए वो दिन' (मेरा नाम जोकर, 1970), 'मैं आशिक हूँ बहारों का' (आशिक, 1962)—ऐसे अनगिनत गीतों की सूची दी जा सकती है। लेकिन 'चंदन सा बदन', 'मेरा प्यार भी तू है', 'आँसू भरी हैं', 'मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए', 'चल अकेला चल अकेला', 'कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे' और 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' जैसे गीत सच्चे मुकेश-भक्तों के लिए दिल के बेहद करीब रहेंगे।
‘झूमती चली हवा, याद आ गया कोई > बुझती बुझती आग को, फिर जला गया कोई > झूमती चली हवा’ ... >
रात का वक्त है, मदमस्त हवा बह रही है। और वह हवा दिल में संजोई किसी की यादों की उस बुझती हुई आग को फिर से सुलगा देती है, जिसे मजबूरी में भूलने की कोशिश की जा रही थी।
‘खो गई हैं मंज़िलें, मिट गये हैं रास्ते > गर्दिशें ही गर्दिशें, अब हैं मेरे वास्ते > अब हैं मेरे वास्ते > और ऐसे में मुझे, फिर बुला गया कोई > झूमती चली हवा’ ... >
अब तो उस तक पहुँचने के सारे रास्ते बंद हो चुके हैं। अब सिर्फ गर्दिशों और भँवर में फँसे रहना ही किस्मत है—जब इंसान खुद को यह समझा रहा होता है, तभी यह हवा फिर से उसे पुकारने लगती है।
’चुप हैं चाँद चाँदनी, चुप ये आसमान है > मीठी मीठी नींद में, सो रहा जहान है > सो रहा जहान है > आज आधी रात को, क्यों जगा गया कोई > झूमती चली हवा’... >
चाँद, चाँदनी और आसमान सब खामोश हैं। पूरी दुनिया चैन की नींद सो रही है, ऐसे में आधी रात को अचानक किसी की यादों ने आकर नींद उड़ा दी है।
‘एक हूक सी उठी, मैं सिहर के रह गया > दिल को अपने थाम के आह भर के रह गया > चाँदनी की ओट से मुस्कुरा गया कोई > झूमती चली हवा’… >
अचानक उठी यादों की इस टीस से मैं काँप उठा हूँ। दिल को थामकर बस एक ठंडी आह भरकर रह जाता हूँ, और ठीक उसी पल चंदेरी रोशनी के पर्दे के पीछे से कोई मुस्कुराता हुआ नज़र आ रहा है।
कला क्षेत्र अमर्याद संभावनाओं से भरपूर हैं, यह बात को स्वीकारते हुए भी, इस गीत को मुकेश के अलावा कोई और न्याय नही कर पाता, यह विचार मन मे आ ही जाता हैं।
नितीन सप्रे
nitinnsapre@gmail.com





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