प्रासंगिक - 'रफ़ी' बस नाम ही काफी

 'रफ़ी' बस नाम ही काफी


प्रतिभा या कला—फिर चाहे वह कोई भी हो—उसका ज़हन में होना अनिवार्य है। शिक्षा और प्रशिक्षण से उसे तराशा तो जा सकता है, लेकिन उसका निर्माण करना असंभव है। यह तो कुदरती देन होती है, जो हर किसी को नसीब नहीं होती। ​अमृतसर ज़िले के कोटला सुल्तान सिंह गाँव में 24 दिसंबर 1924 को जन्मे बालक पर यह कुदरती रहमत खूब बरसी। बचपन में घर के सामने से गुज़रने वाला एक फ़कीर अक्सर यह गीत गाया करता था—"खेडन दे दिन चार नी माए, खेडन दे दिन चार"। उस गाने से प्रभावित होकर छोटा 'फ़िको' उसके पीछे-पीछे चल देता था। बाद में लाहौर जाने पर, बारह-तेरह साल की उम्र में अपने बड़े भाई के सैलून में काम करते-करते फ़िको गुनगुनाकर ग्राहकों को लुभाने लगा। ​गायक-अभिनेता कुंदनलाल सहगल साहब उसके आदर्श थे। इत्तेफ़ाक से किसी कार्यक्रम हेतु सहगल साहब का आकाशवाणी लाहौर जाना हुआ। फ़िको अपने भाई के साथ उन्हें सुनने पहुँचा, मगर बिजली चले जाने के कारण सहगल साहब ने गाने से मना कर दिया। यहीं फ़िको के भाग्य का दरवाज़ा खुला। फ़िको से गाना सुनवाने की बड़े भाई की गुज़ारिश आयोजकों ने मान ली। श्रोताओं के साथ-साथ सहगल साहब को भी फ़िको का गाना इतना पसंद आया कि उन्होंने आशीर्वाद देते हुए कहा, "एक दिन तुम बहुत बड़े गायक बनोगे।" उस महफ़िल में संगीतकार श्याम सुंदर भी मौजूद थे। उन्हीं के संगीत निर्देशन में पंजाबी फ़िल्म 'गुल बलोच' के लिए फ़िको ने अपना पहला गीत गाया। यही 'फ़िको' आगे चलकर बॉलीवुड में—जिसका बस नाम ही काफ़ी है—मोहम्मद रफ़ी के रूप में अमर हो गया और बॉलीवुड की संगीत-धारा पर उनका नाम हमेशा के लिए स्थापित हो गया



मोहम्मद रफ़ी एक हरफ़नमौला गायक थे। किसी भी मानवीय भावना की प्रस्तुति रफ़ी साहब के गले से बेहद सहजता से निकलती थी। मोहब्बत का इज़हार हो, विरह की व्याकुलता हो, हुस्न की तारीफ़ हो, प्रभु-भक्ति हो या देशभक्ति... गीत, ग़ज़ल, नज़्म, कव्वाली, भजन, भाव-संगीत या शास्त्रीय संगीत—किसी भी विधा के साथ कलात्मक न्याय करने में रफ़ी साहब को महारत हासिल थी। शब्दों को अपने सुरों में पिरोकर रफ़ी साहब मानो कद्रदानों को मोतियों का हार पेश करते थे। ​'मधुबन में राधिका नाचे रे', 'अजहुँ न आए बालमा सावन बीता जाए', और 'मन तड़पत हरी दरसन को आज' जैसे शास्त्रीय संगीत पर आधारित फ़िल्मी गीतों को रफ़ी साहब किसी ख़याल गायक के अंदाज़ में प्रस्तुत कर देते थे। प्यार, छेड़छाड़ और नर्म-शृंगार जैसे भाव भी वे गीतों के ज़रिए बड़ी बख़ूबी से अदा करते थे। ​'याद न जाए बीते दिनों की', 'आज मौसम बड़ा बेईमान है', 'अभी ना जाओ छोड़ कर', 'तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा', 'चौदहवीं का चाँद', 'खोया खोया चाँद', 'नी सुल्ताना रे', 'आपके पहलू में आकर रो दिए', 'तुमने पुकारा और हम चले आए', 'आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे', 'रिमझिम के गीत सावन गाये', 'आने से उसके आए बहार', 'इतना है तुमसे प्यार मुझे मेरे राजदार', और 'तुझे देखा तुझे चाहा'—ये सभी गीत इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।



सन 1948 में महात्मा गांधी के निधन के उपरांत, हुस्नलाल-भगतराम के संगीत निर्देशन में जब रफ़ी साहब ने 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की ये अमर कहानी' गीत को अपनी आवाज़ दी, तो वे भारतवर्ष के हर घर में पहुँच गए। मात्र एक महीने के भीतर इस गीत के 10 लाख रिकॉर्ड्स बिके। ​अगले ही साल फ़िल्म 'दुलारी' के लिए शकील बदायूँनी का लिखा और नौशाद जी का स्वरबद्ध किया गीत 'सुहानी रात ढल चुकी' जारी हुआ, जिसने मोहम्मद रफ़ी को पार्श्व गायक (Playback Singer) के रूप में एक मज़बूत पहचान दिलाई (हालांकि इस गीत पर कुंदनलाल सहगल साहब की गायकी की छाप स्पष्ट थी। ​बॉलीवुड में रफ़ी साहब का स्वर्णिम काल 1956 से 1965 तक रहा। अपने करियर में उन्हें कुल 16 बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया, जिनमें से 6 बार वे फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से नवाज़े गए। लाहौर के एक सैलून से अपना संगीतमय सफ़र शुरू करने वाला यह महान गायक, रेडियो सीलोन के मशहूर 'बिनाका गीतमाला' कार्यक्रम का लगातार बीस वर्षों तक बेताज बादशाह रहा। ​रफ़ी साहब ने लगभग सभी संगीत निर्देशकों और अभिनेताओं के लिए गीत गाए। नौशाद साहब को तो वे अपना गुरु ही मानते थे, वहीं ओ. पी. नय्यर के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी। शायद ही कोई विश्वास करे, लेकिन ओ. पी. नय्यर के लिए रफ़ी साहब ने कोरस (Chorus) तक में अपनी आवाज़ दी थी। ​संगीतकार रवि ने रफ़ी साहब से कई भावुक और रोमांटिक गीत गवाए। वहीं सचिन देव बर्मन (बर्मन दादा) ने रफ़ी साहब को अधिकतर गुरुदत्त और देवानंद की आवाज़ बनाया। इस जोड़ी ने 'प्यासा', 'आराधना', 'नौ दो ग्याराह', 'काला बाज़ार', 'गाइड', और 'तेरे घर के सामने' जैसी कई म्यूज़िकल हिट फ़िल्में दीं। ​गीत के बोल और धुन चाहे कितनी भी बेहतरीन क्यों न हों, जब तक गायक उसकी गहराई को न छू ले, तब तक उसकी तासीर (प्रभाव) दिलों को नहीं छू सकती। 'ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं' गीत के लिए शायद सबसे अधिक रीटेक रफ़ी साहब ने दिए थे। गाना ऊँचे स्वर में गाना था और संगीतकार मदन मोहन को हर टेक में कुछ न कुछ खटक रहा था। संगीतकार की पूर्ण संतुष्टि होने तक रफ़ी साहब सात मिनट की अवधि वाले इस गीत के रीटेक देते रहे। गाना उनके लिए सिर्फ़ काम नहीं, बल्कि इबादत था! ​फ़िल्म 'ज़ंजीर' के गीत 'दीवाने हैं दीवानों को घर चाहिए' की रिकॉर्डिंग करके जब रफ़ी साहब स्टूडियो से बाहर निकले, तो उन्हें गीतकार गुलशन बावरा मिले। उन्होंने बताया कि यह गाना उन पर (गुलशन बावरा पर) फ़िल्माया जाने वाला है। यह सुनते ही रफ़ी साहब परेशान हो गए, क्योंकि उन्होंने अमिताभ बच्चन की आवाज़ और शैली को ध्यान में रखकर गाना गाया था। वे तुरंत वापस स्टूडियो गए और गुलशन बावरा को सामने बैठाकर दोबारा गाना रिकॉर्ड किया। यही कारण है कि रफ़ी साहब का गीत जिस भी अभिनेता पर फ़िल्माया गया, ऐसा ही प्रतीत होता है मानो वह अभिनेता स्वयं गा रहा हो। ​1965 में फ़िल्म 'गुमनाम' में शंकर-जयकिशन के निर्देशन में रफ़ी साहब ने पहली बार रॉक एंड रोल गीत ('जान पहचान हो') गाया था। इस गीत को वर्ष 2001 की हॉलीवुड फ़िल्म 'घोस्ट वर्ल्ड' (Ghost World) में भी शामिल किया गया था। ​सन 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म 'नया दौर' ने सफलता की नई ऊँचाइयों को छुआ। बी. आर. चोपड़ा का सितारा बुलंदियों पर था। उन्होंने चाहा कि 'नया दौर' के कलाकार भविष्य में केवल उनके बैनर के लिए ही काम करें। जब यह प्रस्ताव रफ़ी साहब के सामने रखा गया, तो उन्होंने बड़े ही विनम्र भाव से इसे नकार दिया। रफ़ी साहब ने कहा, ​"मेरी आवाज़ तो जनता की अमानत है, अतः जो भी संगीतकार गानों के ज़रिए इसका उपयोग जनता के लिए करना चाहेगा, मुझे उसके लिए गाना ही होगा।" ​रफ़ी साहब का यह जवाब बी. आर. चोपड़ा को रास नहीं आया। उन्होंने रफ़ी साहब से कहा कि वे अब कभी उनके लिए काम नहीं करेंगे और एक नया 'रफ़ी' ढूँढेंगे। उन्होंने अन्य निर्माताओं से भी रफ़ी साहब को गाने न देने का आग्रह किया। इसके चलते कुछ समय के लिए रफ़ी साहब को कम गाने मिले, लेकिन जल्द ही निर्माताओं को एहसास हो गया कि रफ़ी के बिना काम चलना नामुमकिन है। बी. आर. चोपड़ा को भी अपने कदम पीछे खींचने पड़े और एक बार फिर रफ़ी साहब स्वर-पाबंदियों से आज़ाद हो गए। ध्यान देने योग्य बात यह है कि रफ़ी साहब ने चोपड़ा साहब को कोई तल्ख़ जवाब नहीं दिया था, यह काम 'वक़्त' ने खुद कर दिया। ​'जिस रात के ख़्वाब आए वह रात आई'—फ़िल्म 'हब्बा ख़ातून' का यह गीत, नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में गाया गया मोहम्मद रफ़ी साहब का आख़िरी गीत साबित हुआ। नौशाद साहब के गले लगकर भावुक होते हुए उन्होंने कहा था, "मुद्दत बाद एक अच्छा गीत गाया। आज बहुत सुकून मिला, अब जी चाहता है कि इस भरी-पूरी दुनिया को छोड़कर चला जाऊँ।" इस गाने के लिए रफ़ी साहब ने कोई फ़ीस नहीं ली थी। ​अजीब इत्तेफ़ाक था कि इसके कुछ ही समय बाद नौशाद साहब को मोहम्मद रफ़ी साहब के इस भरी दुनिया को अलविदा कह जाने की दुखद ख़बर मिली। 31 जुलाई - 1 अगस्त को मुंबई में मूसलाधार बारिश के बीच भी लाखों की भीड़ अपने लाडले कलाकार को भावभीनी विदाई देने पहुँची थी। उस समय हर किसी के दिल में शायद यही एक गीत गूँज रहा था—'अभी ना जाओ छोड़ कर, ये दिल अभी भरा नहीं'। ​रफ़ी साहब के जीवनकाल के दौर में हमारा जन्म होना, निश्चित रूप से हमारे लिए बड़े सौभाग्य की बात है!



नितीन सप्रे

nitinnsapre@gmail.com





















प्रतिभा या कला फिर चाहे वो कोई भी हो, जहन मे होना अनिवार्य हैं। शिक्षा, प्रशिक्षण  से उसे तराशा तो जा सकता है, लेकिन निर्माण करना असंभव हैं। ये तो कुदरती देन होती हैं, हर किसी को नसीब नही होती। 


अमृतसर जिले के कोटरा सुलतान सिंग गाँव में 24 दिसंबर,1924 को जन्मे बालक पर यह कुदरती रहमत खूब बरसी। बचपन मे घर के सामने आता एक फकीर 'खेडन(खेलन) के दिन चार नी माए खेडन दे दिन चार' यह गीत अक्सर गाता था गाने से प्रभावित होकर छोटा 'फिको’ उसके पीछे चल देता था। फिर लाहोर चले जाने के बाद, बारह तेरह साल की उम्र मे, बडे भाई के सलून मे काम करते करते गुनगुनाकर वो ग्राहकों को लुभाने लगा। गायक आभिनेता कुंदनलाल सहगल उसके आदर्श थे। इत्तफाक से किसी कार्यक्रम हेतू सहगल सहाब  का आकाशवाणी लाहोर जाना हुआ। फिको अपने भाई के साथ उन्हे सुनने तो पहुंचे, मगर बिजली चली जाने से सहगल सहाब ने गाने से मना किया। यही फिको का भाग्य खुला। फिको से गाना सूनाने की बडे भाई की गुजारीश आयोजको ने मान ली। श्रोताओं के साथ साथ सहगल सहाब को भी फिको का गाना इतना पसंद आया की, एक दिन बहोत बडे गायक बनोगे ऐसा आशिर्वचन कह दिया। मेहफिल मे संगीतकार श्याम सुन्दर भी मौजुद थे। उनही के संगीत निर्देशन मे पंजाबी फिल्म 'गुल बलोच' के लिये फिको ने अपना पहेला गीत गाया। यही फिको आगे चल कर, बॉलीवूड मे बस जिस का नाम ही काफी हैं, वो मोहम्मद रफ़ी के रूप मे अजर हो गया। बॉलीवूड की संगीतधारा पर अपना नाम स्थापित हो गया)

मोहम्मद रफ़ी हरफनमौला गायक थे किसी भी मानवी भावना की प्रस्तुती रफ़ी के गले से बडे सहजभाव से होती थी। मोहब्बत का इजहार हो, विरह व्याकुलता हो, हुस्न की तारीफ हो या फिर प्रभुभक्ती, देशभक्ती हो, गीत, गझल, नज्म या कव्वाली हो, भजन, भाव संगीत या शास्त्रीय संगीत हो, किसी भी विधा के साथ कलात्मक न्याय करने मे रफ़ी सहाब को महारत हासिल थी। लब्जों को अपने सुरों मे पिरों कर, रफ़ी मानो मोतियों का हार कद्रदानो को पेश करते थे।


'मधुबन मे राधिका नाचें रे', 'अजहुन आये बालामा सावन बिता जाये', 'मन तडपत हरी दरशन को आज', जैसे शास्त्रीय संगीत पर आधारित फिल्मीगीत, किसी ख्याल गायक की अंदाज मे रफ़ी प्रस्तुत कर देते। प्यार, छेडछाड, नर्मशृंगार जैसे भाव रफ़ी बडे बखुबी से गीतों द्वारा अदा करते है। 'याद न जाये बीते दिनों की', 'आज मौसम बडा बईमान हैं', 'अभी ना जाओ छोड कर, 'तुझे क्या सूनाऊ मैं दिलरुबा','चौदवी का चांद', 'खोया खोया चांद', 'नि सुलताना रे', 'आप के पहेलु मे आकर रो दिये', 'तुम ने पुकारा', 'आज कल तेरे मेरे प्यार की चर्चा', 'रिमझिम के गीत सावन गाये', 'आने से उसके आए बहार', 'इतना हैं तुमसे प्यार मुझे मेरे राजदार', 'तुझे देखा तुझे चाहा' ये सभी गीत इस बात का प्रमाण हैं ।)


सन 1948 मे, गांधीजी की मृत्योपरांत, हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन मे 'सुनो सुनो ए दुनियावालों बापू की ये अमर कहानी' इस गीत को रफ़ी ने आवाज दिया, तो भारतवर्ष के हर घर मे वे पहुंच गए। एक महिने के अंदर इस गीत की 10 लाख रिकॉर्ड्स बेची गयी। अगले ही साल फिल्म 'दुलारी' के लिये शकील बदायुनी का लिखा और नौशाद जी का रचा 'सुहानी रात ढल चुकी' इस गीत ने मोहम्मद रफ़ी को प्ले बॅक सिंगर के रूप में अच्छी पहचान दिलायी। हलांकी गीत पर कुंदनलाल सहगल की मुद्रा स्पष्ट थी। बॉलीवूड मे रफ़ी का स्वर्णीम काल 1956 से 1965 तक रहा। अपने करिअर मे कुल सोलह बार उन्हे फिल्म फेअर का नामांकन मिला तथा छह फिल्म फेअर पुरस्कारों से नवाजा गया। लाहोर की सलून से संगीत सफर सुरू करनेवाला यह गायक रेडिओ सिलोन के मशहूर बिनाका गीतमाला कार्यक्रम का बीस साल बेताज बादशहा रहा।


रफ़ी ने लगभग सभी संगीत निर्देशक तथा अभिनेताओं के लिये गीत गाये। नौशाद को तो वे अपना गुरू ही मानते थे। ओ. पी. नय्यर के साथ उनकी गहरी दोस्ती थी। कोई यकिन नही करेगा, लेकीन ओ. पी. के लिये रफ़ी ने कोरस तक गाया था। संगीतकार रवी ने रफ़ी से कई इमोशनल और रोमँटिक गीत गवाये। बर्मनदा ने रफ़ी को अधिकतर गुरुदत्त और देवानंद का आवाज बनाया। इस जोडी ने 'प्यासा', 'आराधना', 'नौ दो ग्यारह', 'काला बाझार', 'गाईड', 'तेरे घर के सामने' जैसी कई म्युझिकल हिट फिल्म्स बनाई। गीतों के बोल और धून चाहे कितनी भी बढियां क्यू न हो, जबतक गायक उसकी गहराई को ना छु ले तब तक उसका असर, तासिर(शक्ती) दिलों को छू नही सकती। 'ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नही' इस गीत के शायद सब से अधिक रिटेक रफ़ी ने दिये थे। गाना उंचे स्वर मे गाना था। और संगीतकार मदन मोहन को हर टेक मे कुछ ना कुछ खटक रहा था। संगीतकार की पूरी संतुष्टी होने तक रफ़ी सहाब, सात मिनट अवधी के ये गीत के टेक देते रहे। गाना उनके लिये काम नही इबादत थी। फिल्म जंजीर का 'दिवाने हैं दिवानों को घर चाहिए' इस गीत को रिकॉर्ड कर रफ़ी स्टुडिओ से निकले, तभी उनसे गीतकार गुलशन बावरा अचानक से मिले। उन्होंने बताय की ये गाना उन पर फिल्माया जानेवाला हैं। ये सुनते ही रफ़ी सहाब परेशान हुए, क्युकी अमिताभ बच्चन को सामने रख कर उन्होंने गीत गाया था। वो फिर स्टुडिओ गये और उस गीत गुलशन बावरा को सामने रखकर दुबारा गाया। यही कारण हैं, रफ़ी का गीत जिस किसी अभिनेता पर फिल्माया गया हो, वो अभिनेता स्वयं गा रहा है ऐसे ही प्रतीत होता हैं। 1965 मे गुमनाम फिल्म मे शंकर जयकिशन की निर्देशन मे रफ़ी ने पहली बार रॉक अँड रोल गीत गाया था. इस गीत को 2001 की हॉलिवूड फिल्म 'घोस्ट वर्ल्ड' मे लिया गया था।


सन 1957 मे प्रदर्शित 'नया दौर' फिल्म ने कामियाबी की नई उंचाई हासिल की। बी. आर. चोप्रा का सितारा बुलंदियों पर था। उन्होंने सोचा की 'नया दौर' के कलाकार भविष्य मे सिर्फ उनके बॅनर के लिये ही काम करें। पहले प्रस्ताव रफ़ी के सामने रखा, तो उन्होंने उसे बडी विनम्रता से नकार दिया। रफ़ी ने कहा की, "उनकी आवाज तो जनता की अमानत हैं, अत: जो भी संगीतकार उसका उपयोग, गाने के जरिये जनता के लिये करना चाहेगा, उसके लिये मुझे गाना होगा."रफ़ी का यह जबाब बी. आर. चोप्रा को रास नही आया. उन्होंने रफ़ी से कहा की वो अब कभी उनके लिये काम नही करेंगे, वो एक नया रफ़ी  धुंडेंगे। अन्य निर्माताओं को भी रफ़ी को गाना देने से मना किया। रफ़ी को कम गाने मिलने लगे लेकीन कुछ समय बाद निर्माताओं को इस बात का अहसास हुआ की रफ़ी के बिना काम नही चलेगा। बी. आर. चोप्रा को भी पीछे हटना पडा, और फिर एक बार रफ़ी स्वर पाबंदियों से आझाद हुए। गौरतलब हैं की रफ़ी ने चोप्रा को कोई जबाब नही दिया। ये काम 'वक्त' ने किया।


'जिस रात के ख्वाब आए वह रात आई' यह 'हब्बा खातून' फिल्म का गीत, नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में गाया, मोहम्मद रफ़ी का आखरी गीत रहा। नौशाद से गले मिलकर, भावुक होते हुए उन्होंने कहा था, " मुद्दत बाद एक अच्छा गीत गाया। आज बहुत सूकून मिला, अब जी चाहता है कि इस भरी पूरी दुनिया को छोड़कर चला जाऊं''। इस गाने की कोई फी रफी ने नही ली थी। अजीब इत्तेफाक था, कूछ समय बाद नौशाद साहब को इस भरी दुनिया को मोहम्मद रफ़ी सहाब ने अलविदा कहने की ख़बर मिली थी। 31-1 जुलै-अगस्त को मुंबई मे मुसलाधार बारिश होते हुए भी लाखों की भीड अपने लाडले कलाकार को भावभिनी विदाई देते हुए मन मे शायद यही कह रही होगी कभी ना जाओ छोड कर ये दिल अभी भरा नही'। रफी साब के जीवन कालखंड मे हमारा जन्म होना या निश्चित ही सौभाग्य की बात है।)

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